
*अतिथि संपादक राजेश कुमार जी की कलम से.
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- *जिन्होंने चुकाई है विकास की असली कीमत…*
हमारे साथ हैं #शिवलाल_मुंडा जी! ये रांचीके गेतलसूद गांव के निवासी हैं। जी हां, वही गेतलसूद जहां इस नाम से एक बहुत बड़ा डैम है। ये मुझे डैम पर मिले, जो बांध के नीचे खेतों में लगी फसल और चर रही बकरियों की निगरानी कर रहे थे। इनसे इनका नाम और घर पूछा तो इनके स्थानीय होने के कारण थोड़ा बहुत जानने की इच्छा हुई और बड़ी देर तक बातचीत की।
पहले तो इन्होंने मैया सम्मान को लेकर बताया कि, उनके परिवार में किसी भी सदस्य को यह राशि नहीं मिल रही है, जबकि दो-तीन बार फॉर्म भरा गया। सुनकर मुझे तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ। क्योंकि यह सच है कि, वोट के समय मैया सम्मान की राशि देने की जैसी आपाधापी मची थी, वह बाद में कभी दिखाई नहीं दी। कई योग्य पात्रता रखने वाली महिलाएं आज भी इस राशि से वंचित हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
खैर, इन्होंने ही बताया कि, डैम में पानी के ऊपर सोलर प्लेट बिछाए जा रहे हैं, जिससे बिजली की कमी पूरी होगी। मैं तो पहली बार पानी के ऊपर सोलर प्लेट बिछाने का कॉन्सेप्ट देखकर आश्चर्यचकित हुआ।
जब डैम पर बात आई, तो आगे इन्होंने बताया कि, इनकी पुरखों की सारी खेती की जमीन इसी डैम में समा गई है। मतलब अधिग्रहित कर ली गई। बेशक पूर्वजों को बदले में मुआवजा मिला, लेकिन जमीन और खासकर इनके खेत हमेशा-हमेशा के लिए चले गए, इसकी टीस अब भी इनके जेहन में मौजूद है।
बांध के ठीक नीचे जिस खेत में लगी फसल की ये रखवाली कर रहे थे, उसके बारे में भी इन्होंने बताया कि, यह जमीन भी अब हम लोगों की नहीं है, सब डैम बनाते समय ही ले लिया गया है। लेकिन चूंकि इस समय जमीन खाली पड़ी है और पहले भी हम लोगों की थी, इसलिए इसमें थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी कर ले रहे हैं।
तो शिवलाल मुंडा जी अकेले नहीं, जिन्हें एक तरह से विकास की असली कीमत चुकानी पड़ी है। बल्कि ऐसे लोग तो हमारे झारखंड के कोने-कोने में भरे पड़े हैं।
फिर मेरे मन में आया, कि इस तरह के डैम बनाने के लिए कोई दूसरा उपाय तो है नहीं। किसी-न-किसी को तो कुर्बानी देने ही पड़ती है। लेकिन दुख तब होता है, जब विकल्प मौजूद रहने पर भी सरकार की गलत कार्यशैली के कारण उस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। लोगों के विस्थापन से होने वाले दर्द को सिरे से खारिज कर दिया जाता है।
मसलन, रांची के ही नगड़ी में अभी रिम्स 2 का निर्माण कार्य स्थानीय खेतिहर आदिवासियों के विरोध के बावजूद, सुरक्षा बलों को तैनात करके किया जा रहा है।
सोचने की बात है कि, क्या इस जगह के सिवा पूरे झारखंड में ऐसी कोई जमीन नहीं थी, जहां रिम्स 2 को बनाया जा सकता था.? ऐसा करने से पूर्वजों से चली आ रही खेती की इस समृद्ध जमीन की बर्बादी नहीं होती। वह भी ऐसे में, जबकि झारखंड में यूं ही खेती की जमीन कम है!
@विकास की कीमत




